Monday, July 10, 2017

।।ब्रह्मास्त्र महा विद्या श्रीबगला स्तोत्र।।


                  -:- ध्यानम् -:-
मध्ये सुधाब्धि-मणि-मण्डप-रत्न-वेद्याम्,
सिंहासनोपरि-गतां परिपीत-वर्णाम् ।
पीताम्बराभरण-माल्य-विभूषितांगीम्,
देवीं नमामि धृत-मुद्-गर-वैरि-जिह्वाम् ।। १ ।।

अर्थात् अमृत का सागर । बीच में मणि-मण्डप की रत्न-वेदी । उस पर सिंहासन । उस पर पीले रंग की देवी ‘बगला’ आसीन हैं । उनके वस्त्र, आभूषण तथा पुष्प-माला- सब कुछ पीले रंग के ही हैं । बाँएँ हाथ में शत्रु की जीभ खींचकर, दाहिने हाथ से मुद्-गर लेकर, उस पर प्रहार करने जा रही है । उन्हीं माँ बगला को मेरा प्रणाम ।।

जिह्वाग्रमादाय करेण देवीम्,
वामेन शत्रून् परि-पीडयन्तीम् ।
गदाऽभिघातेन च दक्षिणेन,
पीताम्बराढ्यां द्वि-भुजां नमामि ।। २ ।।

अर्थात् बाँएँ हाथ में शत्रु की जीभ को खींचकर, दाहिने हाथ में गदा लेकर प्रहार करती हुई, पीताम्बरा द्वि-भुजा बगला को मेरा प्रणाम ।।

                       ।। मूल-पाठ ।।

चलत्-कनक-कुण्डलोल्लसित-चारु-गण्ड-स्थलीम्,
लसत्-कनक-चम्पक-द्युतिमदिन्दु-बिम्बाननाम् ।
गदा-हत-विपक्षकां कलित-लोल-जिह्वाऽञ्चलाम्,
स्मरामि बगला-मुखीं विमुख-वाङ्-मनस-स्तम्भिनीम् ।। ३ ।।

अर्थात् चञ्चल सुवर्ण-कुण्डलों से शोभित कपोलों वाली तथा कनक एवं चम्पा के पुष्प-सदृश शरीर की कान्ति वाली चन्द्र-मुखी, गदा-प्रहार से विपक्षियों को सदा विनष्ट करनेवाली, सुन्दर चञ्चल-जीभवाली, विमुखों की वाणी और मन का स्तम्भन करनेवाली बगला-मुखी को स्मरण करता हूँ ।

पीयूषोदधि-मध्य-चारु-विलसद्-रत्नोज्जवले मण्डपे,
तत्-सिंहासन-मूल-पतित-रिपुं प्रेतासनाध्यासिनीम् ।
स्वर्णाभां कर-पीडितारि-रसनां भ्राम्यद् गदां विभ्रतीम्,
यस्त्वां ध्यायति यान्ति तस्य विलयं सद्योऽथ सर्वापदः ।। ४  ।।

अर्थात् जो भक्त साधक सुधा-समुद्र के बीच में रत्नोज्ज्वल मण्डप में अनेकानेक रत्न-जटित स्वर्ण-सिंहासन पर आसीन, सुवर्ण कान्ति-वाली, एक हाथ से शत्रु की जीभ और दूसरे से घूमती हुई गदा को धारण किए, प्रेतासन पर बैठी हुई, शत्रुओं के शिरों को झूकानेवाली तुमको ध्यान करता है, उसकी समस्त आपदाएँ, तुरन्त समाप्त हो जाती हैं ।

देवि ! त्वच्चरणाम्बुजार्च-कृते यः पीत-पुष्पाञ्जलिम्,
भक्त्या वाम-करे निधाय च मनुं मन्त्री मनोज्ञाक्षरम् ।
पीठ-ध्यान-परोऽथ कुम्भक-वशाद् बीजं स्मरेत् पार्थिवम्,
तस्यामित्र-मुखस्य वाचि हृदये जाड्यं भवेत् तत्क्षणात् ।। ५ ।।

अर्थात् हे देवि ! जो भक्त तुम्हारे चरण-कमलों के अर्चन में पीत-पुष्पों की अञ्जलि भक्ति-पूर्वक निज वाम कर में रचकर, पीठ-ध्यान में तत्पर होकर, कुम्भक, प्राणायाम द्वारा तुम्हारे मनोज्ञ (मनोहर) अक्षरवाले मन्त्र भूमि-बीज (लं) का स्मरण करता है, उसके शत्रु के मुख-वचन और हृदय में तुरन्त जड़ता व्याप्त हो जाती है ।

वादी मूकति रंकति क्षिति-पतिर्वैश्वानरः शीतति,
क्रोधी शाम्यति दुर्जनः सुजनति क्षिप्रानुगः खञ्जति ।
गर्वी खर्वति सर्व-विच्च जडति त्वन्मन्त्रिणा यन्त्रितः,
श्री-नित्ये, बगला-मुखि ! प्रतिदिनं कल्याणि ! तुभ्यं नमः ।। ६ ।।

अर्थात् तुम्हारे मन्त्र के जानकार साधक के द्वारा यन्त्रित किया गया वादी गूँगा, राजा रंक, अग्नि शीतल, क्रोधी शान्त, दुष्ट-जन सु-जन, तीव्र गतिवाला लँगड़ा, घमण्डी छोटा तथा सर्वज्ञ जड़ हो जाता है । इसीलिए हे कल्याणि ! श्री-स्वरुपे ! नित्ये ! भगवति बगले ! मैं तुम्हें प्रतिदिन नमस्कार करता हूँ ।

मन्त्रस्तावदलं विपक्ष-दलने स्तोत्रं पवित्रं च ते,
यन्त्रं वादि-नियन्त्रणं त्रि-जगतां जत्रं च चित्रं च ते ।
मातः ! श्रीबगलेति नाम ललितं यस्यास्ति जन्तोर्मुखे,
त्वन्नाम-स्मरणेन संसदि मुख-स्तम्भो भवेद् वादिनाम् ।। ७ ।।

अर्थात् विपक्षियों के दमनार्थ तुम्हारा मन्त्र ही पर्याप्त है और तद्-वत् पवित्र स्तोत्र भी । वादियों के नियन्त्रण के लिए त्रिलोक प्रसिद्ध तुम्हारा विजय-शाली-यन्त्र भी विचित्र है । हे माँ ! ‘श्रीबगला’-यह ललित तुम्हारा नाम जिस साधक के मुख को शोभित करता है, वह भाग्य-शाली है, क्योंकि सभा में तुम्हारे नाम का स्मरण करते ही वादियों का मुख स्तम्भित हो जाता है ।

दुष्ट-स्तम्भनमुग्र-विघ्न-शमनं दारिद्र्य-विद्रावणम्,
भूभृत्-सन्दमनं चलन्मृग-दृशां चेतः समाकर्षणम् ।
सौभाग्यैक-निकेतनं सम-दृश कारुण्य-पूर्वेक्षणम्,
मृत्योर्मारणमाविरस्तु पुरतो मातस्त्वदीयं वपुः ।। ८ ।।

अर्थात् दुष्ट जनों का स्तम्भक, उग्र विघ्नों का शामक, दरिद्रता-निवारक, राजाओं का दमन-कारक, मृगाक्षियों के चञ्चल चित्त का समाकर्षक एवं सम-दर्शियों के लिए सौभाग्य का एकमेव निकेतन, करुणा-पूर्ण नेत्रोंवाला और मृत्यु का भी मारक तुम्हारा सुन्दर शरीर हे माँ ! मेरे आगे प्रकट हो ।

मातर्भञ्जय मद्-विपक्ष-वदनं जिह्वां च संकीलय,
ब्राह्मीं मुद्रय दैत्य-देव-धिषणामुग्रां गतिं स्तम्भय ।
शत्रूंश्चूर्णय देवि ! तीक्ष्ण-गदया गौरांगि, पीताम्बरे !
विघ्नौघं बगले ! हर प्रणमतां कारुण्य-पूर्णेक्षणे ! ।। ९ ।।

अर्थात् हे गौरांगि ! पीताम्बरे ! माँ देवि ! मेरे विपक्षियों के मुख को तोड़ दो, उनकी जिह्वा को कील दो, वाणी को बन्द करो, देव और दैत्यों की उग्र बुद्धि तथा गतियों को स्तम्भित करो, अपनी तीक्ष्ण गदा से शत्रुओं को चूर्ण कर दो, अपनी करुणा-पूर्ण दृष्टि से भक्तों के विघ्नों के समूह को दूर करो ।

मातर्भैरवि ! भद्र-कालि विजये ! वाराहि ! विश्वाश्रये !
श्रीविद्ये ! समये ! महेशि ! बगले ! कामेशि ! वामे रमे !
मातंगि ! त्रिपुरे ! परात्पर-तरे ! स्वर्गापवर्ग-प्रदे !
दासोऽहं शरणागतः करुणया विश्ववेश्वरि ! त्राहि माम् ।। १०  ।।

अर्थात् हे माँ बगले ! भैरवी, भद्र-काली, वाराही, भुवनेश्वरी, श्रीविद्या, षोडशी, बाला-त्रिपुर-सुन्दरी, कमला आदि सब तुम्ही हो, स्वर्ग और मोक्ष भी तुम्हीं देती हो, परात्पर ब्रह्म भी तुम हो, मैं तुम्हारा शरणागत हूँ । हे विश्वेश्वरि ! करुणा करके मेरी रक्षा करो ।

त्वं विद्या परमा त्रिलोक-जननी विघ्नौघ-संच्छेदिनी,
योषाकर्षण-कारिणि पशु-मनः-सम्मोह-सम्वर्द्धिनी ।
दुष्टोच्चाटन-कारिणी पशु-मनः-सम्मोह-सन्दायिनी,
जिह्वा-कीलन-भैरवी विजयते ब्रह्मास्त्र-विद्या परा ।। ११ ।।

अर्थात् तुम परमा विद्या हो, त्रिलोकों की जननी हो, विघ्न-समूह की नाशिका हो, स्त्रियों को आकर्षित करने वाली हो, जगत्-त्रय का आनन्द बढ़ाने वाली हो, दुष्टों का उच्चाटन करने वाली हो, पशु-जन के मन को सम्मोह देनेवाली हो और शत्रु की जिह्वा-कीलन करने में भैरवी हो । सदैव विजय देनेवाली परा ब्रह्मास्त्र-विद्या हो ।

विद्या-लक्ष्मीर्नित्य-सौभाग्यमायुः,
पुत्रैः पौत्रैः सर्व-साम्राज्य-सिद्धिः ।
मानं भोगो वश्यमारोग्य-सौख्यम्,
प्राप्तं सर्वं भू-तले त्वत्-परेण ।। १२ ।।

अर्थात् सम्पूर्ण विद्याएँ, लक्ष्मी, नित्य सौभाग्य, दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि-सहित सर्व-साम्राज्य-सिद्धि, मान, भोग, वश्यता, आरोग्यता, सुख आदि समस्त जो-जो भी मनुष्य को प्राप्त होना चाहिए, वह सब तुम्हारी कृपा से इस पृथ्वी पर ही साधक को प्राप्त होता है ।

पीताम्बरां द्वि-भुजां च, त्रि-नेत्रां गात्र-कोमलाम् ।
शिला-मुद्-गर-हस्तां च, स्मरामि बगला-मुखीम् ।। १३ ।।

अर्थात् कोमल शरीरवाली, वज्र और मुद्गर हाथों में धारण करने वाली, त्रि-नेत्र एवं दो भुजाओं वाली पीताम्बरा बगला-मुखी का मैं स्मरण करता हूँ ।

पीत-वस्त्र-लसितामरि-देह-प्रेत-वासन-निवेशित-देहाम्,
फुल्ल-पुष्प-रवि-लोचन-रम्यां दैत्य-जाल-दहनोज्जवल-भूषां ।
पर्यंकोपरि-लसद्-द्विभुजां कम्बु-जम्बु-नद-कुण्डल-लोलाम्,
वैरि-निर्दलन-कारण-रोषां चिन्तयामि बगलां हृदयाब्जे ।। १४ ।।

अर्थात् पीले वस्त्र पहननेवाली, शत्रु के शव पर अधिष्ठाता, फूल की तरह विकसिता और सूर्य की तरह दीप्त लोचन, असुरों के निधन के लिए जो उजले वस्त्र धारण करती है, पलँग पर शोभा पाने वाली द्वि-भुजा देवी, वलयाकार स्वर्ण-कुण्डल-सुशोभिता, शत्रुओं के निधन के लिए जो अत्यन्त क्रोधी हैं, उन्हीं का हृदय-कमल में ध्यान करता हूँ ।

गेहं नाकति, गर्वितः प्रणमति, स्त्री-संगमो मोक्षति,
द्वेषी मित्रति, पातकं सु-कृतति, क्ष्मा-वल्लभो दासति ।
मृत्युर्वैद्यति, दूषण सु-गुणति, त्वत्-पाद-संसेवनात्,
वन्दे त्वां भव-भीति-भञ्जन-करीं गौरीं गिरीश-प्रियाम् ।। १५ ।।

अर्थात् हे माँ ! तुम्हारी चरण-सेवा से घर स्वर्ग बन जाता है, अहंकारी नम्र तथा विनीत बन जाता है, स्त्री-संसर्ग करने वाला मोक्ष प्राप्त करता है, शत्रु मित्र बन जाता है, पापी पुण्यवान् बन जाता है, राजा दास बन जाता है, यम भी वैद्य बन जाता है तथा दुर्गुण सद्गुण में बदल जाता है । हे संसार-भय दूर करने वाली, शिव-प्रिया, गौरी, बगला ! तुम्हारी वन्दना करता हूँ ।

आराध्या जदम्ब ! दिव्य-कविभिः सामाजिकैः स्तोतृभि-
र्माल्यैश्चन्दन-कुंकुमैः परिमलैरभ्यर्च्चिता सादरात् ।
सम्यङ्-न्यासि-समस्त-निवहे, सौभाग्य-शोभा-प्रदे !
श्रीमुग्धे बगले ! प्रसीद विमले, दुःखापहे ! पाहि माम् ।। १६ ।।

अर्थात् अध्यात्म-वादी कवि, सामाजिक जनता और स्तुति करने वाले भक्त जगज्जननी बगला की सादर पूजा करते हैं । पुष्प-माला, चन्दन, कुंकुम और सुगन्धित-द्रव्यों से देवी की आराधना की जाती है । सब प्राणियों के शरीर में सम्यक् रुप से रहने वाली, सौभाग्य-प्रदा, श्री-मुग्धा, विमला, दुःख-हारिणी माँ बगला मेरी रक्षा करें ।

यत्-कृतं जप-सन्नाहं, गदितं परमेश्वरि !
दुष्टानां निग्रहार्थाय, तद् गृहाण नमोऽस्तु ते ।। १७ ।।

अर्थात् हे परमेश्वरि ! दुष्टों के निग्रहार्थ तुम्हारे विषय में जो मैंने जपादि-पूर्वक कहा है, उसे तुम स्वीकार करो, तुम्हें नमस्कार है ।

सिद्धिं साध्येऽवगन्तुं गुरु-वर-वचनेष्वार्ह-विश्वास-भाजाम्,
स्वान्तः पद्मासनस्थां वर-रुचि-बगलां ध्यायतां तार-तारम् ।
गायत्री-पूत-वाचां हरि-हर-नमने तत्पराणां नराणाम्,
प्रातर्मध्याह्न-काले स्तव-पठनमिदं कार्य-सिद्ध प्रदं स्यात् ।। १८ ।।

अर्थात् हे हरि-हर आदि की वन्दनीया माँ बगला ! सद्-गुरु के वचनों में विश्वास रखने वाला, तुममें अटल भक्ति रखने वाला, गायत्री-सिद्ध व्यक्ति, साध्य-विषय में सिद्धि प्राप्ति के लिए अपने हृदय में पद्मासना, उत्तम ज्योति-विशिष्टा बगला का ध्यान कर प्रातः और मध्याह्न में इस स्तव का निरन्तर पाठ करे, तो कार्य सिद्ध होता है ।

विद्या लक्ष्मीः सर्व-सौभाग्यमायुः,
पुत्रैः पौत्रौः सर्व-साम्राज्य-सिद्धिः ।
मानं भोगो वश्यमारोग्य-सौख्यम्,
प्राप्तं सर्वं भू-तले त्वत्-परेण ।। १९ ।।

अर्थात् विद्या, लक्ष्मी, सारे सौभाग्य, आयु, पुत्र-पौत्रादि के साथ सारे साम्राज्य की प्राप्ति, सम्मान, भोग, यश, आरोग्य तथा सुख आदि संसार का सब कुछ तुम्हारी आराधना से प्राप्त होता है ।

यत्-कृतं जप-संध्यानं, चिन्तनं परमेश्वरि !
शत्रूणां स्तम्भनार्थाय, तद् गृहाण नमोऽस्तु ते ।। २० ।।

अर्थात् हे परमेश्वरि ! शत्रुओं के स्तम्भन के लिए मैंने जो जप, ध्यान तथा चिन्तन किया, वह सब ग्रहण करो । तुमको मेरा प्रणाम है ।

                  ।। फल-श्रुति ।।

नित्यं स्तोत्रमिदं पवित्रमिह यो देव्याः पठत्यादरात्,
धृत्वा यन्त्रमिदं तथैव समरे बाहौ करे वा गले ।
राजानोऽप्यरयो मदान्ध-करिणः सर्पा मृगेन्द्रादिकाः,
ते वै यान्ति विमोहिता रिपु-गणा लक्ष्मोः स्थिरा सर्वदा ।। २१ ।।

अर्थात् भगवती पीताम्बरा के इस पवित्र स्तोत्र का पाठ जो साधक नित्य आदर-पूर्वक करता है तथा इनके यन्त्र को बाहु में अथवा कर में या गले में युद्ध-काल में धारण करता है, तो राजा एवं शत्रु-गण विमोहित हो जाते हैं । इतना ही नहीं, इसे साधक को लक्ष्मी की भी स्थिरता प्राप्त होती है ।

संरम्भे चौर-संघे प्रहरण-समये बन्धने व्याधि-मध्ये,
विद्या-वादे विवादे प्रकुपित-नृपतौ दिव्य-काले निशायाम् ।
वश्ये वा स्तम्भने वा रिपु-वध-समये निर्जने वा वने वा,
गच्छँस्तिषठँस्त्रि-कालं यदि पठति शिवं प्राप्नुयादाशु धीरः ।। २२ ।।

अर्थात् हे देवि ! विप्लव-काल में, चोरों के समूह में, शत्रु पर प्रहार-काल में बन्धन में, व्याधि-पीड़ा में, विद्या-सम्बन्धी विवाद में, मौखिक कलह में, नृप-कोप में और रात्रि के दिव्य-काल में, वश्य कार्य में, स्तम्भन में तथा शत्रु-वध के समय, निर्जन स्थान में अथवा वन में कहीं भी चलता हुआ, बैठा हुआ तीनों काल में जो साधक तुम्हारे स्तोत्र का पाठ करता है, वह धीर पुरुष शीघ्र ही कल्याण प्राप्त करता है ।

अनुदिनमभिरामं साधको यस्त्रि-कालम्,
पठति स भुवनेऽसौ पूज्यते देव-वर्गैः ।
सकलममल-कृत्यं तत्त्व-द्रष्टा च लोके,
भवति परम-सिद्धा लोक-माता पराम्बा ।। २३ ।।

अर्थात् जो साधक प्रति-दिन त्रि-सन्ध्या में इसका पाठ करता है, वह इस जगत् में देवताओं के द्वारा पूजित होता है । उसके सारे काम बन जाते हैं और वह संसार में तत्त्व-दर्शी बनता है । जगज्जननी पराम्बा बगला उसके लिए परम सिद्ध देवी बन जाती है ।

ब्रह्मास्त्रमिति विख्यातं, त्रिषु लोकेषु दुर्लभम् ।
गुरु-भक्ताय दातव्यं, न देयं यस्य कस्यचित् ।। २४ ।।

अर्थात् त्रिलोक में ‘ब्रह्मास्त्र’ नाम से ख्यात इस स्तोत्र को सबको न देकर केवल गुरु-भक्त शिष्यों को देना चाहिए ।
         
।। श्रीरुद्र-यामले उत्तर-खण्डे श्रीब्रह्मास्त्र-विद्या श्रीबगला-मुखी स्तोत्रम् ।।

बिल्वपत्र चढाने के 108 मन्त्र

त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुधम् ।
त्रिजन्म पापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१॥

त्रिशाखैः बिल्वपत्रैश्च अच्छिद्रैः कोमलैः शुभैः ।
तव पूजां करिष्यामि एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२॥

सर्वत्रैलोक्यकर्तारं सर्वत्रैलोक्यपालनम् ।
सर्वत्रैलोक्यहर्तारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३॥

नागाधिराजवलयं नागहारेण भूषितम् ।
नागकुण्डलसंयुक्तं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४॥

अक्षमालाधरं रुद्रं पार्वतीप्रियवल्लभम् ।
चन्द्रशेखरमीशानं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५॥

त्रिलोचनं दशभुजं दुर्गादेहार्धधारिणम् ।
विभूत्यभ्यर्चितं देवं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६॥

त्रिशूलधारिणं देवं नागाभरणसुन्दरम् ।
चन्द्रशेखरमीशानं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७॥

गङ्गाधराम्बिकानाथं फणिकुण्डलमण्डितम् ।
कालकालं गिरीशं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८॥

शुद्धस्फटिक सङ्काशं शितिकण्ठं कृपानिधिम् ।
सर्वेश्वरं सदाशान्तं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९॥

सच्चिदानन्दरूपं च परानन्दमयं शिवम् ।
वागीश्वरं चिदाकाशं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१०॥

शिपिविष्टं सहस्राक्षं कैलासाचलवासिनम् ।
हिरण्यबाहुं सेनान्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥११॥

अरुणं वामनं तारं वास्तव्यं चैव वास्तवम् ।
ज्येष्टं कनिष्ठं गौरीशं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१२॥

हरिकेशं सनन्दीशं उच्चैर्घोषं सनातनम् ।
अघोररूपकं कुम्भं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१३॥

पूर्वजावरजं याम्यं सूक्ष्मं तस्करनायकम् ।
नीलकण्ठं जघन्यं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१४॥

सुराश्रयं विषहरं वर्मिणं च वरूधिनम् I
महासेनं महावीरं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१५॥

कुमारं कुशलं कूप्यं वदान्यञ्च महारथम् ।
तौर्यातौर्यं च देव्यं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१६॥

दशकर्णं ललाटाक्षं पञ्चवक्त्रं सदाशिवम् ।
अशेषपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१७॥

नीलकण्ठं जगद्वन्द्यं दीननाथं महेश्वरम् ।
महापापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१८॥

चूडामणीकृतविभुं वलयीकृतवासुकिम् ।
कैलासवासिनं भीमं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१९॥

कर्पूरकुन्दधवलं नरकार्णवतारकम् ।
करुणामृतसिन्धुं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२०॥

महादेवं महात्मानं भुजङ्गाधिपकङ्कणम् ।
महापापहरं देवं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२१॥

भूतेशं खण्डपरशुं वामदेवं पिनाकिनम् ।
वामे शक्तिधरं श्रेष्ठं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२२॥

फालेक्षणं विरूपाक्षं श्रीकण्ठं भक्तवत्सलम् ।
नीललोहितखट्वाङ्गं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२३॥

कैलासवासिनं भीमं कठोरं त्रिपुरान्तकम् ।
वृषाङ्कं वृषभारूढं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२४॥

सामप्रियं सर्वमयं भस्मोद्धूलितविग्रहम् ।
मृत्युञ्जयं लोकनाथं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२५॥

दारिद्र्यदुःखहरणं रविचन्द्रानलेक्षणम् ।
मृगपाणिं चन्द्रमौळिं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२६॥

सर्वलोकभयाकारं सर्वलोकैकसाक्षिणम् ।
निर्मलं निर्गुणाकारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२७॥

सर्वतत्त्वात्मकं साम्बं सर्वतत्त्वविदूरकम् ।
सर्वतत्त्वस्वरूपं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२८॥

सर्वलोकगुरुं स्थाणुं सर्वलोकवरप्रदम् ।
सर्वलोकैकनेत्रं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II२९॥

मन्मथोद्धरणं शैवं भवभर्गं परात्मकम् ।
कमलाप्रियपूज्यं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३०॥

तेजोमयं महाभीमं उमेशं भस्मलेपनम् ।
भवरोगविनाशं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II३१॥

स्वर्गापवर्गफलदं रघुनाथवरप्रदम् ।
नगराजसुताकान्तं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३२॥

मञ्जीरपादयुगलं शुभलक्षणलक्षितम् ।
फणिराजविराजं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३३॥

निरामयं निराधारं निस्सङ्गं निष्प्रपञ्चकम् ।
तेजोरूपं महारौद्रं एकबिल्वं शिवार्पणम् II३४॥

सर्वलोकैकपितरं सर्वलोकैकमातरम् ।
सर्वलोकैकनाथं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३५॥

चित्राम्बरं निराभासं वृषभेश्वरवाहनम् ।
नीलग्रीवं चतुर्वक्त्रं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३६॥

रत्नकञ्चुकरत्नेशं रत्नकुण्डलमण्डितम् ।
नवरत्नकिरीटं च एकबिल्वं शिवार्पणम् II३७॥

दिव्यरत्नाङ्गुलीस्वर्णं कण्ठाभरणभूषितम् ।
नानारत्नमणिमयं एकबिल्वं शिवार्पणम्  II३८॥

रत्नाङ्गुलीयविलसत्करशाखानखप्रभम् ।
भक्तमानसगेहं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II३९॥

वामाङ्गभागविलसदम्बिकावीक्षणप्रियम् ।
पुण्डरीकनिभाक्षं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४०॥

सम्पूर्णकामदं सौख्यं भक्तेष्टफलकारणम् ।
सौभाग्यदं हितकरं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४१॥

नानाशास्त्रगुणोपेतं स्फुरन्मङ्गल विग्रहम् ।
विद्याविभेदरहितं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II४२॥

अप्रमेयगुणाधारं वेदकृद्रूपविग्रहम् ।
धर्माधर्मप्रवृत्तं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II४३॥

गौरीविलाससदनं जीवजीवपितामहम् ।
कल्पान्तभैरवं शुभ्रं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४४॥

सुखदं सुखनाशं च दुःखदं दुःखनाशनम् ।
दुःखावतारं भद्रं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४५॥

सुखरूपं रूपनाशं सर्वधर्मफलप्रदम् ।
अतीन्द्रियं महामायं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४६॥

सर्वपक्षिमृगाकारं सर्वपक्षिमृगाधिपम् ।
सर्वपक्षिमृगाधारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II४७॥

जीवाध्यक्षं जीववन्द्यं जीवजीवनरक्षकम् ।
जीवकृज्जीवहरणं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४८॥

विश्वात्मानं विश्ववन्द्यं वज्रात्मावज्रहस्तकम् ।
वज्रेशं वज्रभूषं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II४९॥

गणाधिपं गणाध्यक्षं प्रलयानलनाशकम् ।
जितेन्द्रियं वीरभद्रं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५०॥

त्र्यम्बकं मृडं शूरं अरिषड्वर्गनाशनम् ।
दिगम्बरं क्षोभनाशं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५१॥

कुन्देन्दुशङ्खधवलं भगनेत्रभिदुज्ज्वलम् ।
कालाग्निरुद्रं सर्वज्ञं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५२॥

कम्बुग्रीवं कम्बुकण्ठं धैर्यदं धैर्यवर्धकम् ।
शार्दूलचर्मवसनं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II५३॥

जगदुत्पत्तिहेतुं च जगत्प्रलयकारणम् ।
पूर्णानन्दस्वरूपं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५४॥

सर्गकेशं महत्तेजं पुण्यश्रवणकीर्तनम् ।
ब्रह्माण्डनायकं तारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५५॥

मन्दारमूलनिलयं मन्दारकुसुमप्रियम् ।
बृन्दारकप्रियतरं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II५६॥

महेन्द्रियं महाबाहुं विश्वासपरिपूरकम् ।
सुलभासुलभं लभ्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ ५७॥

बीजाधारं बीजरूपं निर्बीजं बीजवृद्धिदम् ।
परेशं बीजनाशं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II५८॥

युगाकारं युगाधीशं युगकृद्युगनाशनम् ।
परेशं बीजनाशं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II५९॥

धूर्जटिं पिङ्गलजटं जटामण्डलमण्डितम् ।
कर्पूरगौरं गौरीशं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II६०॥

सुरावासं जनावासं योगीशं योगिपुङ्गवम् ।
योगदं योगिनां सिंहं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६१॥

उत्तमानुत्तमं तत्त्वं अन्धकासुरसूदनम् ।
भक्तकल्पद्रुमस्तोमं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६२॥

विचित्रमाल्यवसनं दिव्यचन्दनचर्चितम् ।
विष्णुब्रह्मादि वन्द्यं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६३॥

कुमारं पितरं देवं श्रितचन्द्रकलानिधिम् ।
ब्रह्मशत्रुं जगन्मित्रं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६४॥

लावण्यमधुराकारं करुणारसवारधिम् ।
भ्रुवोर्मध्ये सहस्रार्चिं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६५॥

जटाधरं पावकाक्षं वृक्षेशं भूमिनायकम् ।
कामदं सर्वदागम्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II६६॥

शिवं शान्तं उमानाथं महाध्यानपरायणम् ।
ज्ञानप्रदं कृत्तिवासं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६७॥

वासुक्युरगहारं च लोकानुग्रहकारणम् ।
ज्ञानप्रदं कृत्तिवासं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६८॥

शशाङ्कधारिणं भर्गं सर्वलोकैकशङ्करम् I
शुद्धं च शाश्वतं नित्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६९॥

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणम् ।
गम्भीरं च वषट्कारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७०॥

भोक्तारं भोजनं भोज्यं जेतारं जितमानसम् I
करणं कारणं जिष्णुं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७१॥

क्षेत्रज्ञं क्षेत्रपालञ्च परार्धैकप्रयोजनम् ।
व्योमकेशं भीमवेषं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७२॥

भवज्ञं तरुणोपेतं चोरिष्टं यमनाशनम् ।
हिरण्यगर्भं हेमाङ्गं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७३॥

दक्षं चामुण्डजनकं मोक्षदं मोक्षनायकम् ।
हिरण्यदं हेमरूपं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II७४॥

महाश्मशाननिलयं प्रच्छन्नस्फटिकप्रभम् ।
वेदास्यं वेदरूपं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II७५॥

स्थिरं धर्मं उमानाथं ब्रह्मण्यं चाश्रयं विभुम् I
जगन्निवासं प्रथममेकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II७६॥

रुद्राक्षमालाभरणं रुद्राक्षप्रियवत्सलम् ।
रुद्राक्षभक्तसंस्तोममेकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७७॥

फणीन्द्रविलसत्कण्ठं भुजङ्गाभरणप्रियम् I
दक्षाध्वरविनाशं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७८॥

नागेन्द्रविलसत्कर्णं महीन्द्रवलयावृतम् ।
मुनिवन्द्यं मुनिश्रेष्ठमेकबिल्वं शिवार्पणम्  II७९॥

मृगेन्द्रचर्मवसनं मुनीनामेकजीवनम् ।
सर्वदेवादिपूज्यं च एकबिल्वं शिवार्पणम् II८०॥

निधनेशं धनाधीशं अपमृत्युविनाशनम् ।
लिङ्गमूर्तिमलिङ्गात्मं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८१॥

भक्तकल्याणदं व्यस्तं वेदवेदान्तसंस्तुतम् ।
कल्पकृत्कल्पनाशं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८२॥

घोरपातकदावाग्निं जन्मकर्मविवर्जितम् ।
कपालमालाभरणं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८३॥

मातङ्गचर्मवसनं विराड्रूपविदारकम् ।
विष्णुक्रान्तमनन्तं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८४॥

यज्ञकर्मफलाध्यक्षं यज्ञविघ्नविनाशकम् ।
यज्ञेशं यज्ञभोक्तारं एकबिल्वं शिवार्पणम्  II८५॥

कालाधीशं त्रिकालज्ञं दुष्टनिग्रहकारकम् ।
योगिमानसपूज्यं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८६॥

महोन्नतमहाकायं महोदरमहाभुजम् ।
महावक्त्रं महावृद्धं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८७॥

सुनेत्रं सुललाटं च सर्वभीमपराक्रमम् ।
महेश्वरं शिवतरं एकबिल्वं शिवार्पणम् II८८॥

समस्तजगदाधारं समस्तगुणसागरम् ।
सत्यं सत्यगुणोपेतं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८९॥

माघकृष्णचतुर्दश्यां पूजार्थं च जगद्गुरोः ।
दुर्लभं सर्वदेवानां एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९०॥

तत्रापि दुर्लभं मन्येत् नभोमासेन्दुवासरे ।
प्रदोषकाले पूजायां एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९१॥

तटाकं धननिक्षेपं ब्रह्मस्थाप्यं शिवालयम्
कोटिकन्यामहादानं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९२॥

दर्शनं बिल्ववृक्षस्य स्पर्शनं पापनाशनम् ।
अघोरपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् II९३॥

तुलसीबिल्वनिर्गुण्डी जम्बीरामलकं तथा ।
पञ्चबिल्वमिति ख्यातं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९४॥

अखण्डबिल्वपत्रैश्च पूजयेन्नन्दिकेश्वरम् ।
मुच्यते सर्वपापेभ्यः एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९५॥

सालङ्कृता शतावृत्ता कन्याकोटिसहस्रकम् ।
साम्राज्यपृथ्वीदानं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९६॥

दन्त्यश्वकोटिदानानि अश्वमेधसहस्रकम् ।
सवत्सधेनुदानानि एकबिल्वं शिवार्पणम् II९७॥

चतुर्वेदसहस्राणि भारतादिपुराणकम् ।
साम्राज्यपृथ्वीदानं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९८॥

सर्वरत्नमयं मेरुं काञ्चनं दिव्यवस्त्रकम् ।
तुलाभागं शतावर्तं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९९॥

अष्टोत्तरश्शतं बिल्वं योऽर्चयेल्लिङ्गमस्तके ।
अधर्वोक्तं अधेभ्यस्तु एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१००॥

काशीक्षेत्रनिवासं च कालभैरवदर्शनम् ।
अघोरपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् II१०१॥

अष्टोत्तरशतश्लोकैः स्तोत्राद्यैः पूजयेद्यथा ।
त्रिसन्ध्यं मोक्षमाप्नोति एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१०२॥

दन्तिकोटिसहस्राणां भूः हिरण्यसहस्रकम्
सर्वक्रतुमयं पुण्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् II१०३॥

पुत्रपौत्रादिकं भोगं भुक्त्वा चात्र यथेप्सितम् ।
अन्ते च शिवसायुज्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१०४॥

विप्रकोटिसहस्राणां वित्तदानाच्च यत्फलम् ।
तत्फलं प्राप्नुयात्सत्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१०५॥

त्वन्नामकीर्तनं तत्त्वं तवपादाम्बु यः पिबेत्
जीवन्मुक्तोभवेन्नित्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१०६॥

अनेकदानफलदं अनन्तसुकृतादिकम् ।
तीर्थयात्राखिलं पुण्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१०७॥

त्वं मां पालय सर्वत्र पदध्यानकृतं तव ।
भवनं शाङ्करं नित्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१०८॥
                       ।।इति।।

Saturday, March 12, 2016

यज्ञ / हवन के लाभ -3

यज्ञ । हवन को सनातन संस्कृति में बहुत अधिक महत्व दिया गया है। आध्यात्मिक दृष्टि के साथ-साथ ये शारीरिक और मानसिक लाभ भी पहुँचाते हैं। पूर्वकाल की कई कथाएं प्रचलित हैं जहाँ यज्ञ के माध्यम से विभिन्न कार्य सिद्ध किये गए निसन्तानों को संतान और कुरूप या रोगी को स्वस्थय और रूपवान बना दिया गया। लेकिन आज परिस्तिथि पूर्णतः भिन्न है। लोगों के पास पूजा का ही समय नहीं है तो कहाँ से करें? कुछ दशक पूर्व तक संध्या करने वाले लोग भी नित्य हवन करते थे विशेषतः ब्राह्मण समुदाय परन्तु अब वहां भी इसका स्थान नहीं के बराबर ही रह गया है। 

यज्ञ के पीछे छिपा विज्ञान:-


"हवन यज्ञ" -2

31. कोटि होम:-
शतमुख, दशमुख, द्विमुख और एक मुख भेद से चार प्रकार का कोटि होम होता है। शतमुख में अथवा 100 कुण्डों के यज्ञ में प्रत्येक कुण्ड पर 10-10 विद्वान हवनकत्र्ता बैठते है। इस प्रकार 100 कुण्डों के हवन में एक हजार (1000) विद्वान होते है। दशमुख अर्थात 100 कुण्डों के यज्ञ में प्रत्येक कुण्ड में 20-20 होता (हवनकर्ता) बैठते है। इस प्रकार 10 कुण्डों के यज्ञ में 200 विद्वान हवनकर्ता बैठने चाहिए। दमुख अर्थात दो कुण्डों के यज्ञ में 50-50 होता बैठते है। इस प्रकार से हवन में 100 विद्वान हवनकर्ता होने चाहिए। एक मुख में अर्थात एक कुण्ड के यज्ञ में हवनकर्ता की संख्या का कोई खास नियम नहीं सामथ्र्य के अनुसार जितने भी विद्वान हवनार्थ बैठाना चाहे बैठा सकता हैं सौ कुण्डों का कोटि होम बहुत बडा महायज्ञ कहा जाता है। कोटि यज्ञ में सामग्री 200 मन लगती है।
32. गायत्री यज्ञ:-
गायत्री महायज्ञ में चैबीस लाख (2400000) आहुतियां होती हैं चैबीस लाख आहुतियों के गायत्री महायज्ञ में 55 मन अथवा 60 मन हवन सामग्री लगती हैं इस यज्ञ में 61 अथवा 71 विद्वान होते है। यह महायज्ञ 9 अथवा 11 दिन में होता हैै। गायत्री महायज्ञ में 1,5,9 अथवा 24 कुण्ड होते है।
33. शतचण्डी:-
शतचण्डी 5 दिन में अथवा 9 दिन में होती हैं पांच अथवा नव दिन की शतचण्डी में दुर्गा पाठ कराने के लिए 13 विद्वान होते है। शत चण्डी में हवन सामग्री सवा मन (50 किलों) लगती है। शत चण्डी
सर्वदा की जा सकती है।

"हवन यज्ञ" -1


यज्ञ दो प्रकार के होते है- श्रौत और स्मार्त। श्रुति पति पादित यज्ञो को श्रौत यज्ञ और स्मृति प्रतिपादित यज्ञो को स्मार्त यज्ञ कहते है। श्रौत यज्ञ में केवल श्रुति प्रतिपादित मंत्रो का प्रयोग होता है और स्मार्त यज्ञ में वैदिक पौराणिक और तांत्रिक मंन्त्रों का प्रयोग होता है। वेदों में अनेक प्रकार के यज्ञों का वर्णन मिलता है। किन्तु उनमें पांच यज्ञ ही प्रधान माने गये हैं - 1. अग्नि होत्रम, 2. दर्शपूर्ण मासौ, 3. चातुर्म स्यानि, 4. पशुयांग, 5. सोमयज्ञ, ये पाॅंच प्रकार के यज्ञ कहे गये है, यह श्रुति प्रतिपादित है। वेदों में श्रौत यज्ञों की अत्यन्त महिमा वर्णित है। श्रौत यज्ञों को श्रेष्ठतम कर्म कहा है कुल श्रौत यज्ञो को १९ प्रकार से विभक्त कर उनका संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है।
1. स्मार्त यज्ञः- 
विवाह के अनन्तर विधिपूर्वक अग्नि का स्थापन करके जिस अग्नि में प्रातः सायं नित्य हनादि कृत्य किये जाते है। उसे स्मार्ताग्नि कहते है। गृहस्थ को स्मार्ताग्नि में पका भोजन प्रतिदिन करना चाहिये।
2. श्रोताधान यज्ञः-
दक्षिणाग्नि विधिपूर्वक स्थापना को श्रौताधान कहते है। पितृ संबंधी कार्य होते है।
3. दर्शभूर्णमास यज्ञः-
अमावस्या और पूर्णिमा को होने वाले यज्ञ को दर्श और पौर्णमास कहते है। इस यज्ञ का अधिकार सपत्नीक होता है। इस यज्ञ का अनुष्ठान आजीवन करना चाहिए यदि कोई जीवन भर करने में असमर्थ है तो 30 वर्ष तक तो करना चाहिए।
4. चातुर्मास्य यज्ञः-
चार-चार महीने पर किये जाने वाले यज्ञ को चातुर्मास्य यज्ञ कहते है इन चारों महीनों को मिलाकर चतुर्मास यज्ञ होता है।
5. पशु यज्ञः-
प्रति वर्ष वर्षा ऋतु में या दक्षिणायन या उतरायण में संक्रान्ति के दिन एक बार जो पशु याग किया जाता है। उसे निरूढ पशु याग कहते है।
6. आग्रजणष्टि (नवान्न यज्ञ) :-
प्रति वर्ष वसन्त और शरद ऋतुओं नवीन अन्न से यज्ञ गेहूॅं, चावल से जा यज्ञ किया जाता है उसे नवान्न कहते है।
7. सौतामणी यज्ञ (पशुयज्ञ) :-
इन्द्र के निमित्त जो यज्ञ किया जाता है सौतामणी यज्ञ इन्द्र संबन्धी पशुयज्ञ है यह यज्ञ दो प्रकार का है। एक वह पांच दिन में पुरा होता है। सौतामणी यज्ञ में गोदुग्ध के साथ सुरा (मद्य) का भी प्रयोग है। किन्तु कलियुग में वज्र्य है। दूसरा पशुयाग कहा जाता है। क्योकि इसमें पांच अथवा तीन पशुओं की बली दी जाती है।
8. सोम यज्ञः-
सोमलता द्वारा जो यज्ञ किया जाता है उसे सोम यज्ञ कहते है। यह वसन्त में होता है यह यज्ञ एक ही दिन में पूर्ण होता है। इस यज्ञ में 16 ऋत्विक ब्राह्मण होते है।
9. वाजपये यज्ञः-
इस यज्ञ के आदि और अन्त में वृहस्पति नामक सोम यग अथवा अग्निष्टोम यज्ञ होता है यह यज्ञ शरद रितु में होता है।
10. राजसूय यज्ञः-
राजसूय या करने के बाद क्षत्रिय राजा समाज चक्रवर्ती उपाधि को धारण करता है।
11. अश्वमेघ यज्ञ:-
इस यज्ञ में दिग्विजय के लिए (घोडा) छोडा जाता है। यह यज्ञ दो वर्ष से भी अधिक समय में समाप्त होता है। इस यज्ञ का अधिकार सार्वभौम चक्रवर्ती राजा को ही होता है।
12. पुरूष मेघयज्ञ:-
इस यज्ञ समाप्ति चालीस दिनों में होती है। इस यज्ञ को करने के बाद यज्ञकर्ता गृह त्यागपूर्वक वान प्रस्थाश्रम में प्रवेश कर सकता है।
13. सर्वमेघ यज्ञ:-
इस यज्ञ में सभी प्रकार के अन्नों और वनस्पतियों का हवन होता है। यह यज्ञ चैंतीस दिनों में समाप्त होता है।
14. एकाह यज्ञ:-
एक दिन में होने वाले यज्ञ को एकाह यज्ञ कहते है। इस यज्ञ में एक यज्ञवान और सौलह विद्वान होते है।
15. रूद्र यज्ञ:-
यह तीन प्रकार का होता हैं रूद्र महारूद्र और अतिरूद्र रूद्र यज्ञ 5-7-9 दिन में होता हैं महारूद्र 9-11 दिन में होता हैं। अतिरूद्र 9-11 दिन में होता है। रूद्रयाग में 16 अथवा 21 विद्वान होते है। महारूद्र में 31 अथवा 41 विद्वान होते है। अतिरूद्र याग में 61 अथवा 71 विद्वान होते है। रूद्रयाग में हवन सामग्री 11 मन, महारूद्र में 21 मन अतिरूद्र में 70 मन हवन सामग्र्री लगती है।
16. विष्णु यज्ञ:-
यह यज्ञ तीन प्रकार का होता है। विष्णु यज्ञ, महाविष्णु यज्ञ, अति विष्णु योग- विष्णु योग में 5-7-8 अथवा 9 दिन में होता है। विष्णु याग 9 दिन में अतिविष्णु 9 दिन में अथवा 11 दिन में होता हैं विष्णु याग में 16 अथवा 41 विद्वान होते है। अति विष्णु याग में 61 अथवा 71 विद्वान होते है। विष्णु याग में हवन सामग्री 11 मन महाविष्णु याग में 21 मन अतिविष्णु याग में 55 मन लगती है।
17. हरिहर यज्ञ:-
हरिहर महायज्ञ में हरि (विष्णु) और हर (शिव) इन दोनों का यज्ञ होता है। हरिहर यज्ञ में 16 अथवा 21 विद्वान होते है। हरिहर याग में हवन सामग्री 25 मन लगती हैं। यह महायज्ञ 9 दिन अथवा 11 दिन में होता है।
18. शिव शक्ति महायज्ञ:-
शिवशक्ति महायज्ञ में शिव और शक्ति (दुर्गा) इन दोनों का यज्ञ होता है। शिव यज्ञ प्रातः काल और श शक्ति (दुर्गा) इन दोनों का यज्ञ होता है। शिव यज्ञ प्रातः काल और मध्याहन में होता है। इस यज्ञ में हवन सामग्री 15 मन लगती है। 21 विद्वान होते है। यह महायज्ञ 9 दिन अथवा 11 दिन में सुसम्पन्न होता है।
19. राम यज्ञ:-
राम यज्ञ विष्णु यज्ञ की तरह होता है। रामजी की आहुति होती है। रामयज्ञ में 16 अथवा 21 विद्वान हवन सामग्री 15 मन लगती है। यह यज्ञ 8 दिन में होता है।
20. गणेश यज्ञ:-
गणेश यज्ञ में एक लाख (100000) आहुति होती है। 16 अथवा 21 विद्वान होते है। गणेशयज्ञ में हवन सामग्री 21 मन लगती है। यह यज्ञ 8 दिन में होता है।
21. ब्रह्म यज्ञ (प्रजापति यज्ञ):-
प्रजापत्ति याग में एक लाख (100000) आहुति होती हैं इसमें 16 अथवा 21 विद्वान होते है। प्रजापति यज्ञ में 12 मन सामग्री लगती है। 8 दिन में होता है।
22. सूर्य यज्ञ:-
सूर्य यज्ञ में एक करोड़ 10000000 आहुति होती है। 16 अथवा 21 विद्वान होते है। सूर्य यज्ञ 8 अथवा 21 दिन में किया जाता है। इस यज्ञ में 12 मन हवन सामग्री लगती है।
23. दूर्गा यज्ञ:-
दूर्गा यज्ञ में दूर्गासप्त शती से हवन होता है। दूर्गा यज्ञ में हवन करने वाले 4 विद्वान होते है। अथवा 16 या 21 विद्वान होते है। यह यज्ञ 9 दिन का होता है। हवन सामग्री 10 मन अथवा 15 मन लगती है।
24. लक्ष्मी यज्ञ:-
लक्ष्मी यज्ञ में श्री सुक्त से हवन होता है। लक्ष्मी यज्ञ (100000) एक लाख आहुति होती है। इस यज्ञ में 11 अथवा 16 विद्वान होते है। या 21 विद्वान 8 दिन में किया जाता है। 15 मन हवन सामग्री लगती है।
25. लक्ष्मी नारायण महायज्ञ:-
लक्ष्मी नारायण महायज्ञ में लक्ष्मी और नारायण का ज्ञन होता हैं प्रात लक्ष्मी दोपहर नारायण का यज्ञ होता है। एक लाख 8 हजार अथ्वा 1 लाख 25 हजार आहुतियां होती है। 30 मन हवन सामग्री लगती है। 31 विद्वान होते है। यह यज्ञ 8 दिन 9 दिन अथवा 11 दिन में पूरा होता है।
26. नवग्रह महायज्ञ:-
नवग्रह महायज्ञ में नव ग्रह और नव ग्रह के अधिदेवता तथा प्रत्याधि देवता के निर्मित आहुति होती हैं नव ग्रह महायज्ञ में एक करोड़ आहुति अथवा एक लाख अथवा दस हजार आहुति होती है। 31, 41 विद्वान होते है। हवन सामग्री 11 मन लगती है। कोटिमात्मक नव ग्रह महायज्ञ में हवन सामग्री अधिक लगती हैं यह यज्ञ ९ दिन में होता हैं इसमें 1,5,9 और 100 कुण्ड होते है। नवग्रह महायज्ञ में नवग्रह के आकार के 9 कुण्डों के बनाने का अधिकार है।
27. विश्वशांति महायज्ञ:-
विश्वशांति महायज्ञ में शुक्लयजुर्वेद के 36 वे अध्याय के सम्पूर्ण मंत्रों से आहुति होती है। विश्वशांति महायज्ञ में सवा लाख (123000) आहुति होती हैं इस में 21 अथवा 31 विद्वान होते है। इसमें हवन सामग्री 15 मन लगती है। यह यज्ञ 9 दिन अथवा 4 दिन में होता है।
28. पर्जन्य यज्ञ (इन्द्र यज्ञ):-
पर्जन्य यज्ञ (इन्द्र यज्ञ) वर्षा के लिए किया जाता है। इन्द्र यज्ञ में तीन लाख बीस हजार (320000) आहुति होती हैं अथवा एक लाख 60 हजार (160000) आहुति होती है। 31 मन हवन सामग्री लगती है। इस में 31 विद्वान हवन करने वाले होते है। इन्द्रयाग 11 दिन में सुसम्पन्न होता है।
29. अतिवृष्टि रोकने के लिए यज्ञ:-
अनेक गुप्त मंत्रों से जल में 108 वार आहुति देने से घोर वर्षा बन्द हो जाती है।
30. गोयज्ञ:-
वेदादि शास्त्रों में गोयज्ञ लिखे है। वैदिक काल में बडे-बडे़ गोयज्ञ हुआ करते थे। भगवान श्री कृष्ण ने भी गोवर्धन पूजन के समय गौयज्ञ कराया था। गोयज्ञ में वे वेदोक्त दोष गौ सूक्तों से गोरक्षार्थ हवन गौ पूजन वृषभ पूजन आदि कार्य किये जाते है। जिस से गौसंरक्षण गौ संवर्धन, गौवंशरक्षण, गौवंशवर्धन गौमहत्व प्रख्यापन और गौसड्गतिकरण आदि में लाभ मिलता हैं गौयज्ञ में ऋग्वेद के मंत्रों द्वारा हवन होता है। इस में सवा लाख 250000 आहुति होती हैं गौयाग में हवन करने वाले 21 विद्वान होते है। यह यज्ञ 8 अथवा 9 दिन में सुसम्पन्न होता है।