Saturday, December 27, 2014

(एक सत्य घटना) तुलसी माला की महिमा


एक सत्य घटना

राजस्थान में जयपुर के पास एक इलाका है – लदाणा। पहले वह एक छोटी सी रियासत थी। उसका राजा एक बार शाम के समय बैठा हुआ था। उसका एक मुसलमान नौकर किसी काम से वहाँ आया। राजा की दृष्टि अचानक उसके गले में पड़ी तुलसी की माला पर गयी। राजा ने चकित होकर पूछाः
"क्या बात है, क्या तू हिन्दू बन गया है ?"
"नहीं, हिन्दू नहीं बना हूँ।"
"तो फिर तुलसी की माला क्यों डाल रखी है ?"
"राजासाहब ! तुलसी की माला की बड़ी महिमा है।"
"क्या महिमा है ?"
"राजासाहब ! मैं आपको एक सत्य घटना सुनाता हूँ। एक बार मैं अपने ननिहाल जा रहा था। सूरज ढलने को था। इतने में मुझे दो छाया-पुरुष दिखाई दिये, जिनको हिन्दू लोग यमदूत बोलते हैं। उनकी डरावनी आकृति देखकर मैं घबरा गया। तब उन्होंने कहाः
"तेरी मौत नहीं है। अभी एक युवक किसान बैलगाड़ी भगाता-भगाता आयेगा। यह जो गड्ढा है उसमें उसकी बैलगाड़ी का पहिया फँसेगा और बैलों के कंधे पर रखा जुआ टूट जायेगा। बैलों को प्रेरित करके हम उद्दण्ड बनायेंगे, तब उनमें से जो दायीं ओर का बैल होगा, वह विशेष उद्दण्ड होकर युवक किसान के पेट में अपना सींग घुसा देगा और इसी निमित्त से उसकी मृत्यु हो जायेगी। हम उसी का जीवात्मा लेने आये हैं।"
राजासाहब ! खुदा की कसम, मैंने उन यमदूतों से हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि ऽयह घटना देखने की मुझे इजाजत मिल जाय।ऽ उन्होंने इजाजत दे दी और मैं दूर एक पेड़ के पीछे खड़ा हो गया। थोड़ी ही देर में उस कच्चे रास्ते से बैलगाड़ी दौड़ती हुई आयी और जैसा उन्होंने कहा था ठीक वैसे ही बैलगाड़ी को झटका लगा, बैल उत्तेजित हुए, युवक किसान उन पर नियंत्रण पाने में असफल रहा। बैल धक्का मारते-मारते उसे दूर ले गये और बुरी तरह से उसके पेट में सींग घुसेड़ दिया और वह मर गया।"
राजाः "फिर क्या हुआ ?"
नौकरः "हजूर ! लड़के की मौत के बाद मैं पेड़ की ओट से बाहर आया और दूतों से पूछाः ऽइसकी रूह (जीवात्मा) कहाँ है, कैसी है ?"
वे बोलेः ऽवह जीव हमारे हाथ नहीं आया। मृत्यु तो जिस निमित्त से थी, हुई किंतु वहाँ हुई जहाँ तुलसी का पौधा था। जहाँ तुलसी होती है वहाँ मृत्यु होने पर जीव भगवान श्रीहरि के धाम में जाता है। पार्षद आकर उसे ले जाते हैं।ऽ
हुजूर ! तबसे मुझे ऐसा हुआ कि मरने के बाद मैं बिहिश्त में जाऊँगा कि दोजख में यह मुझे पता नहीं, इसले तुलसी की माला तो पहन लूँ ताकि कम से कम आपके भगवान नारायण के धाम में जाने का तो मौका मिल ही जायेगा और तभी से मैं तुलसी की माला पहनने लगा।
कैसी दिव्य महिमा है तुलसी-माला धारण करने की ! इसीलिए हिन्दुओं में किसी का अंत समय उपस्थित होने पर उसके मुख में तुलसी का पत्ता और गंगाजल डाला जाता है, ताकि जीव की सदगति हो जाय।

तुलसी व तुलसी-माला की महिमा


तुलसीदल एक उत्कृष्ट रसायन है। यह गर्म और त्रिदोषशामक है। रक्तविकार, ज्वर, वायु, खाँसी एवं कृमि निवारक है तथा हृदय के लिए हितकारी है। सफेद तुलसी के सेवन से त्वचा, मांस और हड्डियों के रोग दूर होते हैं। काली तुलसी के सेवन से सफेद दाग दूर होते हैं। तुलसी की जड़ और पत्ते ज्वर में उपयोगी हैं। वीर्यदोष में इसके बीज उत्तम हैं तुलसी की चाय पीने से ज्वर, आलस्य, सुस्ती तथा वातपित्त विकार दूर होते हैं, भूख बढ़ती है।

तुलसी की महिमा बताते हुए भगवान शिव नारदजी से कहते हैं-

पत्रं पुष्पं फलं मूलं शाखा त्वक स्कन्धसंज्ञितम्।
तुलसीसंभवं सर्वं पावनं मृत्तिकादिकम्॥  (पद्मपुराण, उत्तर खंडः २४.२)

ऽतुलसी का पत्ता, फूल, फल, मूल, शाखा, छाल, तना और मिट्टी आदि सभी पावन हैं। जहाँ तुलसी का समुदाय हो, वहाँ किया हुआ पिण्डदान आदि पितरों के लिए अक्षय होता है।तुलसी सेवन से शरीर स्वस्थ और सुडौल बनता है। मंदाग्नि, कब्जियत, गैस, अम्लता आदि रोगों के लिए यह रामबाण औषधि सिद्ध हुई है। गले में तुलसी की माला धारण करने से जीवनशक्ति बढ़ती है, बहुत से रोगों से मुक्ति मिलती है। तुलसी की माला पर भगवन्नाम जप करने से एवं गले में पहनने से आवश्यक एक्युप्रेशर बिन्दुओं पर दबाव पड़ता है, जिससे मानसिक तनाव में लाभ होता है, संक्रामक रोगों से रक्षा होती है तथा शरीर स्वास्थ्य में सुधार होकर दीर्घायु की प्राप्ति होती है। तुलसी माला धारण करने से शरीर निर्मल, रोगमुक्त व सात्त्विक बनता है। तुलसी शरीर की विद्युत संरचना को सीधे प्रभावित करती है। इसको धारण करने से शरीर में विद्युतशक्ति का प्रवाह बढ़ता है तथा जीव-कोशों द्वारा धारण करने के सामर्थ्य में वृद्धि होती है।
गले में माला पहने से बिजली की लहरें निकलकर रक्त संचार में रूकावट नहीं आनि देतीं। प्रबल विद्युतशक्ति के कारण धारक के चारों ओर चुम्बकीय मंडल विद्यमान रहता है।
तुलसी की माला पहनने से आवाज सुरीली होती है, गले के रोग नहीं होते, मुखड़ा गोरा, गुलाबी रहता है। हृदय पर झूलने वाली तुलसी माला फेफड़े और हृदय के रोगों से बचाती है। इसे धारण करने वाले के स्वभाव में सात्त्विकता का संचार होता है।
तुलसी की माला धारक के व्यक्तित्व को आकर्षक बनाती है। कलाई में तुलसी का गजरा पहनने से नब्ज नहीं छूटती, हाथ सुन्न नहीं होता, भुजाओं का बल बढ़ता है। तुलसी की जड़ें कमर में बाँधने से स्त्रियों को, विशेषतः गर्भवती स्त्रियों को लाभ होता है। प्रसव वेदना कम होती है और प्रसूति भी सरलता से हो जाती है। कमर में तुलसी की करधनी पहनने से पक्षाघात नहीं होता, कमर, जिगर, तिल्ली, आमाशय और यौनांग के विकार नहीं होते हैं।
यदि तुलसी की लकड़ी से बनी हुई मालाओं से अलंकृत होकर मनुष्य देवताओं और पितरों के पूजनादि कार्य करे तो वह कोटि गुना फल देने वाला होता है। जो मनुष्य तुलसी की लकड़ी से  बनी हुई माला भगवान विष्णु को अर्पित करके पुनः प्रसाद रूप से उसे भक्तिपूर्वक धारण करता है, उसके पातक नष्ट हो जाते हैं।
तुलसी दर्शन करने पर सारे पाप-समुदाय का नाश कर देती है, स्पर्श करने पर शरीर को पवित्र बनाती है, प्रणाम करने पर रोगों का निवारण करती है, जल से सींचने पर यमराज को भी भय पहुँचाती है, तुलसी लगाने पर भगवान के समीप ले जाती है और भगवद चरणों में चढ़ाने पर मोक्षरूपी फल प्रदान करती है।

Thursday, October 9, 2014

श्री बगलामुखी की उपासना विधि


ॐ हल्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिहवां कीलय बुद्धिं विनाशय हल्रीं ॐ स्वाहा 

दस महाविद्याओं में एक का नाम बगुला मुखी है। वेदों में इनका नाम बल्गामुखी है। इनकी आराधना मात्र से साधक के सारे संकट दूर हो जाते हैं, शत्रु परास्त होते हैं और श्री वृद्धि होती है। बगलामुखी का जप साधारण व्यक्ति भी कर सकता है, लेकिन इनकी तंत्र उपासना किसी योग्य व्यक्ति के सान्निध्य में ही करनी चाहिए। देवी के अर्गला स्तोत्र का पाठ करने मात्र से इनकी आराधना हो जाती है। साधक को पीले वस्त्र (बिना सिले) पहनकर पीले आसन पर बैठकर सरसों के तेल का दीपक जलाकर पीली सरसों से यज्ञ करना चाहिए। इससे उसके सारे मनोरथ पूर्ण होंगे और शत्रु परास्त होंगे। यह महारुद्र की शक्ति हैं।

इस शक्ति की आराधना करने से साधक के शत्रुओं का शमन तथा कष्टों का निवारण होता है। यों तो बगलामुखी देवी की उपासना सभी कार्यों में सफलता प्रदान करती है, परंतु विशेष रूप से युद्ध, विवाद, शास्त्रार्थ, मुकदमे, और प्रतियोगिता में विजय प्राप्त करने, अधिकारी या मालिक को अनुकूल करने, अपने ऊपर हो रहे अकारण अत्याचार से बचने और किसी को सबक सिखाने के लिए बगलामुखी देवी का वैदिक अनुष्ठान सर्वश्रेष्ठ, प्रभावी एवं उपयुक्त होता है। असाध्य रोगों से छुटकारा पाने, बंधनमुक्त होने, संकट से उद्धार पाने और नवग्रहों के दोष से मुक्ति के लिए भी इस मंत्र की साधना की जा सकती है।

कृत युग में पूरे संसार को नष्ट करने वाला तूफान उठा, उसे देख जगत रक्षक श्री हरि भगवान विष्णु चिंतातुर हुए और सौराष्ट्र में स्थित हरिद्रा सरोवर के समीप जाकर उन्होंने तपस्या की। उनकी तपस्या से महात्रिपुर संदरी प्रसन्न होकर देवी बगला के रूप में प्रकट हुईं तथा तूफान को शांत किया। इन्हीं की शक्ति पर तीनों लोक टिके हुए हैं। विष्णु पत्नी सारे जगत की अधिष्ठान ब्रह्म स्वरूप हैं। तंत्र में शक्ति के इसी रूप को ‘‘श्री बगलामुखी महाविद्या कहा गया है। वैदिक एवं पौराणिक शास्त्रों में श्री बगलामुखी महाविद्या का वर्णन अनेक स्थलों पर मिलता है। शत्रु के विनाश के लिए जो कृत्य विशेष को भूमि में गाड़ देते हैं, उनका नाश करने वाली महाशक्ति श्री बगलामुखी ही हैं।

श्री बगला देवी को शक्ति भी कहा गया है। सत्य काली च श्री विद्या कमला भुवनेश्वरी। सिद्ध विद्या महेशनि त्रिशक्तिर्बगला शिवे॥ मंत्र महार्णव के अनुसार इस मंत्र का एक लाख जप करने से पुरश्चरण होता है। अन्य तंत्र ग्रंथों के अनुसार पुरश्चरण के लिए सवा लाख जप का विधान है। भेरूतंत्र के अनुसार यह मंत्र दस हजार के जप से ही सिद्ध हो जाता है। इसका जप नित्य नियत संख्या में ही करना चाहिए। जप का दशांश हवन, तर्पण और मार्जन कर ब्राह्मण तथा कन्या भोजन कराना चाहिए। पुरश्चरण २१ दिनों में सरलतापूर्वक संपन्न हो सकता है। प्राणी के शरीर में एक अथर्वा नाम का प्राण सूत्र भी होता है। प्राणरूप होने से हम इसे स्थूल रूप से देखने में असमर्थ होते हैं। यह एक प्रकार की वायरलेस टेलीग्राफी है। हजारों योजन दूर रहने वाले आत्मीय के दुख से हमारा चि जिस परोक्ष शक्ति के माध्यम से व्याकुल हो जाता है, उसी परोक्ष सूत्र का नाम अथर्वा है। इस शक्ति सूत्र के माध्यम से हजारां किमी दूर स्थित व्यक्ति से संपर्क संभव है। दूसरे अथर्वागिरा में अभिचार प्रयोग होता है। इसका उसी अथर्वा सूत्र से संबंध है। अथर्वा सूत्र रूपी इसी महाशक्ति का नाम बल्गामुखी है। उपासना: बगलामुखी की साधना में साधना के नियमों को जानना तथा उनका पालन करना अत्यंत आवश्यक है। साधना किसी प्रवीण गुरु से दीक्षा लेकर ही करनी चाहिए। बगलामुखी साधना के लिए ‘ऽवीर राजीऽऽ विशेष सिद्धिप्रदा मानी गई है। यदि सूर्य मकर राशिस्थ हो, मंगलवार को चतुर्दशी हो तो उसे वीर राजी कहा जाता है। इसी राजी में अर्द्धरात्रि के समय देवी श्री बगलामुखी प्रकट हुई थीं।

महाविद्या बगलामुखी का ३६ अक्षरों का मंत्र इस प्रकार है।
पीताम्बर धरी भूत्वा पूर्वाशामि मुखः स्थितिः। लक्ष्मेकं जयेन्मंत्रं हरिद्रा ग्रन्थि मालया॥ ब्रह्मचर्य  नित्यं प्रचरो ध्यान तत्परः। प्रियंगु कुसुमेनादि पीत पुस्पै होमयेत॥
बगलामुखी देवी के जप में पीले रंग का विशेष महत्व है। अनुष्ठानकर्ता को पीले वस्त्र पहनने चाहिए। पीले कनेर के फूलों का विशेष विधान है। देवी की पूजा तथा होम में पीले पुष्पों का प्रयोग करना चाहिए और हल्दी की गांठ की माला से पूजा करनी चाहिए। उसे ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए तथा सदैव स्वच्छ तन और मन से भगवती का ध्यान करना चाहिए। जप आसन पर पूर्वाभिमुख बैठकर करना चाहिए। जप से पूर्व आसन शुद्धि, भूशुद्धि, भूतशुद्धि, अंग न्यास, करन्यास आदि करने चाहिए तथा प्रतिदिन जप के अंत मे दशांश होम पीले पुष्पों से अवश्य करना चाहिए। जप करने से पूर्व यह ध्यान करना आवश्यक है।

साधना विधि: सुबह स्नानादि कर स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें। फिर देवी के चित्र को एक चैकी पर पीला वस्त्र बिछाकर उस पर पूर्व की ओर मुख करके स्थापित कर षोडशोपचार विधि से पूजन करें। साधना में वस्त्र, आसन, माला, गंध, अक्षत, पुष्प, फल आदि भी पीले रंग के होने चाहिए। साधना काल में बगला यंत्र की स्थापना भी अवश्य करनी चाहिए। यंत्र को शिव मंत्र ‘‘¬ नमः शिवायःऽऽ से अभिमंत्रित करना चाहिए। फिर उसे किसी पात्र में रखकर पंचामृत, दूध या शुद्ध जल और सुगंधित चंदन, कस्तूरी से स्थापित करें। इसके बाद निम्न गायत्री मंत्र का उच्चारण करते हुए यंत्र का स्पर्श कर कुशामन से अभिमंत्रित करें।

मंत्र- ‘यंत्र राजाय विद्महे महा यंत्राय धीमहि तन्नो यंत्रः प्रचोदयात्। फिर देवी-देवता की भाव सिद्ध के लिए अष्टोर शतबार पढ़ें। अष्टोरशतं देवि-देवता भाव सिद्धेय॥ आत्म शुद्धि ततः कृत्वा षडंगे देवता यजेत्। तत्रावाहं महादेवी जीवन्यासं च कारयेत॥ फिर महादेव जी का आवाहन करके प्राणन्यास करें। संकल्प:- आचमन एवं प्राणायाम करने के बाद देशकाल संकीर्तन करके बगलामुखी मंत्र की सिद्धि के लिए जप संख्या के निर्देश और तत दशांश क्रमशः हवन, तर्पण, मार्जन और ब्राह्मण भोजन रूप पुरश्चरण करने का संकल्प करें।

विनियोग मंत्र:- अस्य श्री बगलामुखीमंत्रस्य नारदऋषिः त्रिष्टुपछन्दः बगलामुखी देवता बीजं स्वाहा शक्तिः मम अखिलावाप्तये जपे विनियोगः।
इससे उसमें प्राण शक्ति आ जाएगी। फिर अभीष्ट सिद्धि हेतु उपरोक्त मंत्र का जप करें। फिर देवी को यथा योग्य सामग्री अर्पित कर भक्ति भाव से प्रणाम करें। इस प्रकार से जो साधक साधना करता है, उसे सभी फल प्राप्त हो जाते हैं ।
हृदयादि षडंगन्यास:- हृदयाय नमः। बगलामुखी शिरसे स्वाहा। 
सर्वदुष्टानां शिखायै वषट्। 
वाचं मुखं पदं स्तम्भय कवचाय हुम्। 
जिह्नां कीलय नेत्रत्रयाय वौषट 
बुद्धिं विनाशय स्वाहा अस्त्राय फट्। 
अथ ध्यानम्:- सुधा सागर के मध्य मणियों से जड़ित मंडप में रत्नों से बनी वेदी पर स्वर्ण सिंहासन पर देवी विराजमान हैं। सिंहासन, मंडप तथा आसपास का वातावरण सब पीतवर्ण के हैं। मां पीले रंग के ही वस्त्र, मुकुट, माला, पीतवर्ण के ही रत्नों से जड़े स्वर्णाभूषण पहने हुए हैं। उन्होंने बायें हाथ में शत्रु की जीभ और दाहिने में मुद्गर पकड़ रखा है। ऐसी दो भुजाओं वाली देवी भगवती बगलामुखी को नमस्कार है। ऐसा ध्यान करके मानसोपचारों से पूजा करके पीठ पूजा करनी चाहिए। 

पीठ आदि पर रचित सर्वतोभद्रमंडल में मंडूकादि परतत्वांत पीठ देवताओं को स्थापित करके ¬ मं मण्डूकादि परतत्वान्त पीठ देवताम्भ्यो नमः मंत्र से पूजा करके नव पीठशक्तियों की निम्नलिखित मंत्रों से पूजा करें। पूर्वाद्यष्टसु दिक्षु:- जयायै नमः (१) ¬ विजयायै नमः (२) ¬ अजितायै नमः (३) ¬ अपराजितायै नमः (४) ¬ नित्यायै नमः (५) ¬ विलासिन्यै नमः (६) ¬ दोग्ध्यै नमः (७) ¬ अघोरायै नमः (८) मध्ये ¬ मंगलायै नमः (९) इति पीठ शक्तीः पूजयेत। ततः स्वर्णादि निर्मितं यंत्रं ताम्रपात्रे निधाय धृतेनाभ्यज्य तदुपरि दुग्धधारां जलधारां च दत्वा स्वच्छ वस्त्रेण सम्प्रोक्ष्य तदुपरि चंदनागुरुकर्पूरेण पूजनार्थ यंत्र विलिरव्य। बगलामुखी योगपीठाय नमः इति मंत्रेण पुष्पाधासनं दत्वा पीठ मध्ये संस्थाप्य प्रतिष्ठां च कृत्वा पुनध्र्यात्वा मूलेन मूर्ति प्रकल्प्य पाद्यादि पुष्पान्तैरूपचारैः सम्पूज्य देव्याज्ञां ग्रहीत्वा आवरण पूजां कुर्यात। तद्यथाः। इसके बाद सोने से निर्मित यंत्र को ताम्रपत्र में रखकर उस पर घी का अभ्यंग करके उस पर दूध और जल की धारा दें। तदनंतर उसे स्वच्छ वस्त्र से पोंछकर उसके ऊपर चंदन, अगरबत्ती और कपूर से पूजा के लिए यंत्र लिखें। बगलामुखी योगपीठाय नमः। मंत्र से पुष्पाद्यासन देकर पीठ के बीच स्थापित करके उसकी प्राण प्रतिष्ठा करें। 

फिर ध्यान कर मूल से मूर्ति की प्रकल्पना करें और पाद्य आदि से पुष्पान्जलि दान पर्यन्त उक्त उपचारों से पूजा करके देवी से आज्ञा लेकर आवरण पूजा करें। इत्यावरणपूजां कृत्वां धूपादि नमस्कारान्तं सम्पूज्य जपं कुर्यात अस्य पुरश्चरणं लक्ष जपः चम्पक कुसुमैर्दशांशतो होमः तद्दशांशेन तर्पण मार्जन ब्राह्मण भोजनानि कुर्यात। एवं कृते मंत्रः सिद्धौ भवति एतस्मिन्सिद्धे मंत्रे मंत्र प्रयोगान साधयेत। 

इस प्रकार आवरण पूजा करके धूपदान से नमस्कार तक पूजा कर जप करें। चम्पा के फूलों से दशांश होम और तद्दशांश तर्पण और मार्जन कर ब्राह्मण भोजन कराएं। ऐसा करने से मंत्र सिद्ध होता है। इस प्रकार ध्यान करके एक लाख जप करें। तदनंतर चंपा के दस हजार फूलों से होम करके पूर्वोक्त पीठ में इस देवी की पूजा करें। इस प्रकार साधक मंत्र को सिद्ध करके देवतादि को स्तंभित करें। साधना पीले वस्त्र और पीली माला धारण कर तथा पीले आसन पर बैठ कर करें। होम पीले फूलों से और मंत्र का जप हल्दी की माला से करें। जप दस हजार करें। मधु, घी और शर्करा मिश्रित तिल से किया जाने वाला हवन (होम) मनुष्यों को वश में करने वाला माना गया है। यह हवन आकर्षण बढ़ाता है। तेल से सिक्त नीम के पत्तों से किया जाने वाला हवन विद्वेष दूर करता है। रात्रि में श्मशान की अग्नि में कोयले, घर के धूम, राई और माहिष गुग्गल के होम से शत्रु का शमन होता है। गिद्ध तथा कौए के पंख, कड़वे तेल, बहेड़े, घर के धूम और चिता की अग्नि से होम करने से साधक के शत्रुओं को उच्चाटन लग जाता है। दूब, गुरुच और लावा को मधु, घी और शक्कर के साथ मिलाकर होम करने पर साधक सभी रोगों को मात्र देखकर दूर कर देता है। 

कामनाओं की सिद्धि के लिए पर्वत पर, महावन में, नदी के तट पर या शिवालय में एक लाख जप करें। एक रंग की गाय के दूध में मधु और शक्कर मिलाकर उसे तीन सौ मन्त्रों से अभिमंत्रित करके पीने से सभी विषों की शक्ति समाप्त हो जाती है और साधक शत्रुओं की शक्ति तथा बुद्धि का स्तम्भन करने में सक्षम होता है। शत्रुओं पर विजय आदि के लिए बगलामुखी यंत्र की उपासना से बढ़कर और कोई उपासना नहीं है। इसका प्रयोग प्राचीनकाल से ही हो रहा है। श्री प्रजापति ने इनकी उपासना वैदिक रीति से की और वह सृष्टि की रचना करने में सफल हुए। उन्होंने इस विद्या का उपदेश सनकादिक मुनियों को दिया। फिर सनत्कुमार ने श्री नारद को और श्री नारद ने यह ज्ञान संख्यायन नामक परमहंस को दिया। संख्यायन ने बंगला तंत्र की रचना की जो ३६ पटलों में उपनिबद्ध है। श्री परशुराम जी ने यह विद्या के ढ़ोग बताई। महर्षि च्यवन ने इसी विद्या के प्रभाव से इंद्र के वज्र को स्तंभित किया था। श्रमद्गोविन्द पाद की समाधि में विघ्न डालने वाली रेवा नदी का स्तंभन श्री शंकराचार्य ने इसी विद्या के बल पर किया था। तात्पर्य यह कि इस तंत्र के साधक का शत्रु चाहे कितना भी प्रबल क्यों न हो, वह साधक से पराजित अवश्य होता है। अतः किसी मुकदमे में विजय, षड्यंत्र से रक्षा तथा राजनीति में सफलता के लिए इसकी साधना अवश्य करनी चाहिए। परंतु ध्यान रहे, उपासना किसी योग्य और कुशल गुरु के मार्गदर्शन में ही करें।

Saturday, September 20, 2014

मन्त्र क्या है


मंत्र क्या है .....
मंत्र का अर्थ
मंत्र का अर्थ शास्त्रों में ‘मन: तारयति इति मंत्र:ऽ के रूप में बताया गया है, अर्थात मन को तारने वाली ध्वनि ही मंत्र है। वेदों में शब्दों के संयोजन से ऐसी ध्वनि उत्पन्न की गई है, जिससे मानव मात्र का मानसिक कल्याण हो। ‘बीज मंत्रऽ किसी भी मंत्र का वह लघु रूप है, जो मंत्र के साथ उपयोग करने पर उत्प्रेरक का कार्य करता है। यहां हम यह भी निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि बीज मंत्र मंत्रों के प्राण हैं या उनकी चाबी हैं
जैसे एक मंत्र-‘श्रींऽ मंत्र की ओर ध्यान दें तो इस बीज मंत्र में ‘शऽ लक्ष्मी का प्रतीक है, ‘रऽ धन सम्पदा का, ‘ईऽ प्रतीक शक्ति का और सभी मंत्रों में प्रयुक्त ‘बिन्दुऽ दुख हरण का प्रतीक है। इस तरह से हम जान पाते हैं कि एक अक्षर में ही मंत्र छुपा होता है। इसी तरह ऐं, ह्रीं, क्लीं, रं, वं आदि सभी बीज मंत्र अत्यंत कल्याणकारी हैं। हम यह कह सकते हैं कि बीज मंत्र वे गूढ़ मंत्र हैं, जो किसी भी देवता को प्रसन्न करने में कुंजी का कार्य करते हैं
मंत्र शब्द मन +त्र के संयोग से बना है !मन का अर्थ है सोच ,विचार ,मनन ,या चिंतन करना ! और "त्र " का अर्थ है बचाने वाला , सब प्रकार के अनर्थ, भय से !लिंग भेद से मंत्रो का विभाजन पुरुष ,स्त्री ,तथा नपुंसक के रूप में है !पुरुष मन्त्रों के अंत में "हूं फट " स्त्री मंत्रो के अंत में "स्वाहा " ,तथा नपुंसक मन्त्रों के अंत में "नमः " लगता है ! मंत्र साधना का योग से घनिष्ठ सम्बन्ध है......
मंत्रों की शक्ति--
मंत्रों की शक्ति तथा इनका महत्व ज्योतिष में वर्णित सभी रत्नों एवम उपायों से अधिक है।
मंत्रों के माध्यम से ऐसे बहुत से दोष बहुत हद तक नियंत्रित किए जा सकते हैं जो रत्नों तथा अन्य उपायों के द्वारा ठीक नहीं किए जा सकते।
ज्योतिष में रत्नों का प्रयोग किसी कुंडली में केवल शुभ असर देने वाले ग्रहों को बल प्रदान करने के लिए किया जा सकता है तथा अशुभ असर देने वाले ग्रहों के रत्न धारण करना वर्जित माना जाता है क्योंकि किसी ग्रह विशेष का रत्न धारण करने से केवल उस ग्रह की ताकत बढ़ती है, उसका स्वभाव नहीं बदलता। इसलिए जहां एक ओर अच्छे असर देने वाले ग्रहों की ताकत बढ़ने से उनसे होने वाले लाभ भी बढ़ जाते हैं, वहीं दूसरी ओर बुरा असर देने वाले ग्रहों की ताकत बढ़ने से उनके द्वारा की जाने वाली हानि की मात्रा भी बढ़ जाती है। इसलिए किसी कुंडली में बुरा असर देने वाले ग्रहों के लिए रत्न धारण नहीं करने चाहिएं।
वहीं दूसरी ओर किसी ग्रह विशेष का मंत्र उस ग्रह की ताकत बढ़ाने के साथ-साथ उसका किसी कुंडली में बुरा स्वभाव बदलने में भी पूरी तरह से सक्षम होता है। इसलिए मंत्रों का प्रयोग किसी कुंडली में अच्छा तथा बुरा असर देने वाले दोनो ही तरह के ग्रहों के लिए किया जा सकता है।
साधारण हालात में नवग्रहों के मूल मंत्र तथा विशेष हालात में एवम विशेष लाभ प्राप्त करने के लिए नवग्रहों के बीज मंत्रों तथा वेद मंत्रों का उच्चारण करना चाहिए।
मंत्र जाप-
मंत्र जाप के द्वारा सर्वोत्तम फल प्राप्ति के लिए मंत्रों का जाप नियमित रूप से तथा अनुशासनपूर्वक करना चाहिए।
वेद मंत्रों का जाप केवल उन्हीं लोगों को करना चाहिए जो पूर्ण शुद्धता एवम स्वच्छता का पालन कर सकते हैं।
किसी भी मंत्र का जाप प्रतिदिन कम से कम १०८ बार जरूर करना चाहिए। सबसे पहले आप को यह जान लेना चाहिए कि आपकी कुंडली के अनुसार आपको कौन से ग्रह के मंत्र का जाप करने से सबसे अधिक लाभ हो सकता है तथा उसी ग्रह के मंत्र से आपको जाप शुरू करना चाहिए।
बीज मंत्र-
ॐ कार मंत्र जैसे दूसरे २० मंत्र और हैं ।
उनको बोलते हैं बीज मंत्र ।
उसका अर्थ खोजो तो समझ में नही आएगा लेकिन अंदर की शक्तियों को विकसित कर देते हैं ।
सब बिज मंत्रो का अपना-अपना प्रभाव होता है ।
जैसे ॐ कार बीज मंत्र है ऐसे २० दूसरे भी हैं ।
ॐ बं ये शिवजी की पूजा में बीज मंत्र लगता है ।
ये बं बं.... अर्थ को जो तुम बं बं.....जो शिवजी की पूजा में करते हैं।
लेकिन बं.... उच्चारण करने से वायु प्रकोप दूर हो जाता है ।
गठिया ठीक हो जाता है । शिव रात्रि के दिन सवा लाख जप करो
बं..... शब्द, गैस ट्रबल कैसी भी हो भाग जाती है ।
खं.... हार्ट-टैक कभी नही होता है । हाई बी.पी., लो बी.पी. कभी नही
होता । ५० माला जप करें, तो लीवर ठीक हो जाता है ।
१०० माला जप करें तो शनि देवता के ग्रह का प्रभाव चला जाता है । खं शब्द ।
ऐसे ही ब्रह्म परमात्मा का कं शब्द है । ब्रह्म वाचक । तो ब्रह्म
परमात्मा के ३ विशेष मंत्र हैं । ॐ, खं और कं ।
ऐसे ही रामजी के आगे भी एक बीज मंत्र लग जाता है -
रीं रामाय नम:॥
कृष्ण जी के मंत्र के आगे बीज मंत्र लग जाता है -
क्लीं कृष्णाय नम: ॥
तो जैसे एक-एक के आगे, एक-एक के साथ मिंडी लगा दो तो १०
गुना हो गया ।
ऐसे ही आरोग्य में भी ॐ हुं विष्णवे नम: । तो हुं बिज मंत्र है ।
ॐ बिज मंत्र है । विष्णवे..., तो विष्णु भगवान का सुमिरन ।
ये आरोग्य के मंत्र हैं ।
महामृत्युंजय मंत्र : पूर्ण मंत्र एवम विधि-
(मूल संस्कृत एवं हिन्दी अनुवाद सहित)
कहा जाता है कि यह मंत्र भगवान शिव को प्रसन्न कर उनकी असीम कृपा प्राप्त करने का माध्यम है… इस मंत्र का सवा लाख बार निरंतर जप करने से आने वाली अथवा मौजूदा बीमारियां तथा अनिष्टकारी ग्रहों का दुष्प्रभाव तो समाप्त होता ही है, इस मंत्र के माध्यम से अटल मृत्यु तक को टाला जा सकता है…
हमारे चार वेदों में से एक ऋग्वेद में महामृत्युंजय मंत्र इस प्रकार दिया गया है…
ॐ त्र्यम्बकम यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनात मृत्योर्मुक्षीय मामृतात॥
इस मंत्र को संपुटयुक बनाने के लिए के लिए इसका उच्चारण इस प्रकार किया जाता है…
ॐ हौं जूं स: ॐ भूर्भुवः स्वः
ॐ त्र्यम्बकम यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनात मृत्योर्मुक्षीय मामृतात॥
ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ
इस मंत्र का अर्थ है : हम भगवान शंकर की पूजा करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो प्रत्येक श्वास में जीवन शक्ति का संचार करते हैं, जो सम्पूर्ण जगत का पालन-पोषण अपनी शक्ति से कर रहे हैं… उनसे हमारी प्रार्थना है कि वे हमें मृत्यु के बंधनों से मुक्त कर दें, जिससे मोक्ष की प्राप्ति हो जाए… जिस प्रकार एक ककड़ी अपनी बेल में पक जाने के उपरांत उस बेल-रूपी संसार के बंधन से मुक्त हो जाती है, उसी प्रकार हम भी इस संसार-रूपी बेल में पक जाने के उपरांत जन्म-मृत्यु के बन्धनों से सदा के लिए मुक्त हो जाएं, तथा आपके चरणों की अमृतधारा का पान करते हुए शरीर को त्यागकर आप ही में लीन हो जाए!!! 

Thursday, September 18, 2014

दुर्गा पूजन​

1 उत्पत्ती
मां दुर्गा की पूजा त्रेता युग और द्वापर युग से चली आ रही है। सत्युग के सावर्णि मन्वन्तर में जब दैत्य महिषासुर ने प्रजापती ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर यह बर्दान प्राप्त किया, की उसकी मृत्यु किसी स्त्री से हो। ऐसा बर्दान प्राप्त कर वह स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया । सभीदेवता ब्रह्मा जी के पास पहुँचे और ब्रह्मा जी भगवान विष्णु के पास सभी देवताओं को लेकर आये ।  देवताओं के मुख से उनके दु:ख का कारण जान भगवान विष्णु बोले- इस संकट​ से हमें भोलेनाथ ही  उबार सकते हैं, इस प्रकार सभी देवता मिल कर कैलाश पर्वत पर पहुँचे जहां भगवान शिव और माता पार्वती सदा विराजमान होते हैं। सभी देवताओं ने भगवान शिव और माता पार्वती को देख स्तुती करने लगे।

वंदे देवऽमापति सुरगुरुं वंदे जगत्कारणम् वंदे पन्नगभूषणं मृगधरं वंदे पशूनां पतिम्।
वंदे सूर्यशशांकवह्विनयनं वंदे मुकुंदप्रियम्, वंदे भक्तजनाश्रृयं च वरदं वंदे शिवं शंकरम्।

भगवान शिव ने जब सभी देवताओं के दु:ख को जान कर त्रिदेवों ने मिलकर एक दिव्य शक्ती को प्रकट किया ।

ॐ घण्टाशूलहलानि शड्खमुसले चक्रं धनु: सायकं हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्।
गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महापूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥

अपने हाथों मे घण्टा, शूल​, हल​, शड्ख, मूसल​, चक्र लिए माता भगवती प्रकट हुई। तब पराम्बा ने महालक्ष्मी महासरस्वती और माता पार्वती का आह्वाहन किया और अपनी शक्ती को एकत्रित कर दो-दो स्वरूपों को प्रकट किया। १ शैलपुत्री २ ब्रह्मचारिणी ३  चन्द्रघण्टा ४ कूष्माण्डा ५ स्कन्दमाता ६ कात्यायनी ७ कालरात्री ८ महागौरी ९ सिद्धिदात्री।
इस प्रकार नव दुर्गा मिलकर अपनी सेविका योगनियों का आह्वाहन कर उन दैत्यों का बध करना आरम्भकर दिया। सर्वप्रथम मधु और कैटभ का वध किया बाद में महिष दानव का वध किया और साथ ही शुम्भ निशुम्भ​,रक्त वीज नमक दैत्य का वध किया । और इस प्रकार देवताओं ने मिल कर माता जगदम्बा की स्तुती की -

देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य​। 
प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य​॥

दूसरी नवरात्री अश्विन माह में मनाया जाता है। देवीभागवतानुशार भगवान राम जी ने रावण को पराजित करने के लिए नवदिन तक व्रत करके माता दुर्गा को प्रशन्न कर लंका पर विजय प्राप्त किया, तभी से यह दिन विजयदशवी के नाम से प्रसिद्ध हुआ और इस प्रकार अश्विन माह के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक यह व्रत कर माता पराम्बा का कृपा प्राप्त की जाती है।

2 मंत्र
इस व्रत में नवार्ण मंत्र का जप (ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुन्डायै विच्चै ) अवश्य करना चाहिए।
  साथ ही दुर्गा सप्तसती का पाठ करें।

क्यों करते हैं
मार्कण्डेय पुराणानुसार
स्वारोचिषेऽन्तरे पूर्वं चैत्रवंशसमुद्भव​:। सुरथो नाम राजा भूत्समस्ते क्षितिमण्डले॥
अर्थात​- स्वारोचिषमन्वन्तर में सुरथ नाम के एक राजा थे, जो चैत्र वंशमें उत्पन्न हुए थे। एक बार​ युद्ध में परास्त हुए और उनका सारा राज्य छीन लिया गया। तब वन में भटकते हुये राजा सुरथ मेधा मुनि के आश्रम में जा पहुँचे। राजा ने अपना दुख मेधा मुनि को बताया तब उन्होंने माता दुर्गा के नवरात्रि व्रत रहने कहा इस प्रकार राजा उसी आश्रम में रहकर चैत्र की नवरात्रि व्रत को किया नौ दिन तक कठोर व्रत कर माता दुर्गा के प्राकट्य की महिमा श्रवण की, राज के इस व्रत से प्रसन्न हो माता भगवती प्रकट हो गई। राजा ने माता से  अपने दूसरे जन्म तक नष्ट न होने बाला राज्य मांगा साथ ही अपने सत्रुओं से अपना राज्य पुन​: प्राप्त करने का  आशिर्वाद मांगा । और इस प्रकार राजा ने पुन: अपना राज्य प्राप्त किया तभी से चैत्र माह की शुक्ल पक्ष में की प्रतिपदा से नवमी तक यह किया जाता है।

4 उच्चारण
दुर्गा सप्तसती का पाठ संस्कृत में करना उत्तम है, जिन्हें संस्कृत पढ़ना नहीं आता वे त्रुटियों से बचने के लिए हिन्दी का पाठ कर सकते हैं। पाठ करते समय पवित्रता का ध्यान रखें। उच्चारण स्पष्ट, शुद्ध हो यह भी ध्यान रखें।

5  पाठ संख्या
दुर्गासप्तसती का पाठ नौ दिनों में नौ पाठ पूरा करना चाहिए।
 कब करें
यह व्रत वर्ष में दो बार किया जाता है । एक चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक दूसरा अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक इस व्रत को मनाया जाता है।

मुहूर्त​
२५ सितम्बर दिन गुरुवार​ अश्विन शुक्ल प्रतिपदा के दिन प्रात:काल ०६ बजकर १४ मिनट से ०७ बजकर ५४ मिनट तक रहेगा इसके पश्चात दोपहर ११:४९ से १२:३६ मिनट तक के मध्य में भी घट स्थापना किया जा सकता है ।

कहां करें
यह व्रत आप घर में अथवा मन्दिर में कर सकते हैं ।

कैसे करें
सर्व प्रथम माता के पूजन में लगने बाले सामग्री को एकत्रित करें, माता का झांकी तैयार करें। व्रह्मण के द्वारा सोडषोप्चार विधी से पूजन करें। घट स्थापन करें। अखण्ड दीप का पूजन करें। दुर्गासप्तसती का नौ दिवस पर्यन्त पाठ करें।
10  पूजा विधी
पवित्र वस्त्र धारण कर माता की प्रतिमा के सम्मुख रक्तवर्णासन में वैठें। देह शुद्धी, अन्तर शुद्धी, आचमन, आसन शुद्धी, तिलक धारण, उपवीत धारण, ज्योति प्रज्वलन आदि से प्रारम्भ कर, माता गौरी,गणपती जी का ध्यान आह्वाहन पूजन करें, अब वरुण कलश​, मात्रिका, नवग्रह, पञ्चलोकपाल​, भैरवदेव और हनुमान जी का पूजन कर घटस्थपन संकल्प माता पराम्बा का आह्वाहन पूजन सोलह उपचारों से करें। अब सप्तसती पाठ का संकल्प कर विनयोग न्यास करने के बाद पाठ का प्रारम्भ करें। पाठ पूरा हो जाने पर आरती पुष्पाञ्जली कर क्षमा प्रार्थना करें।

11  सावधानीयाँ
व्रत के समय में चावल​, प्याज​, लहसुन का उपयोग भोजन में न करें

 झूठ​, ईर्शा, द्वेश, क्रोध से बचें। सयन के लिए चारपाई के स्थान पर भूमि का उपयोग करें।

Wednesday, August 6, 2014

गणेश और तुलसी

सनातन धर्म में तुलसी माता घर-घर पूजी जाती हैं। जगन्नाथ भगवान श्री कृष्ण को तुलसी के बिना भोग ही नहीं लगता। हिंदू धर्म में तुलसी को सर्वाधिक पवित्र तथा माता स्वरुप माना जाता है। आयुर्वेद की दृष्टि से भी तुलसी को औषधीय गुणों वाला पौधा माना जाता है तथा इसे संजीवनी की संज्ञा दी गई है। शास्त्रों में तुलसी को मां लक्ष्मी कहकर पुकारा गया है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी तुलसी के पत्तों का सेवन अनेक रोगों के उपचार में काम आता है। अनेक ग्रंथो में भी तुलसी की महिमा का बखान हुआ है।

परंतु क्या आप जानते हैं के विष्णु प्रिया तुलसी को भगवान गणेश की पूजा में निषेध क्यों माना गया है।  पद्मपुराण के श्लोक के अनुसार-
न तुलस्या गणाधिपम्‌
अर्थात तुलसी से गणेश जी की पूजा कभी न की जाए। कार्तिक माहात्म्य के इस श्लोक के अनुसार-
गणेश तुलसी पत्र दुर्गा नैव तु दूर्वाया
अर्थात गणेश जी की तुलसी पत्र और दुर्गा जी की दूब से पूजा न करें। पवित्र तुलसी के गणेश पूजन में निषेध को लेकर शास्त्रों में एक दृष्टांत मिलता है।

पौराणिक काल में गणेश जी गंगा तट पर तपस्या में विलीन थे। इसी कालावधि में धर्मात्मज की नवयौवना कन्या तुलसी ने विवाह की इच्छा लेकर तीर्थ यात्रा पर प्रस्थान किया। देवी तुलसी सभी तीर्थस्थलों का भ्रमण करते हुए गंगा के तट पर पंहुची। गंगा तट पर देवी तुलसी ने युवा तरुण गणेश जी को देखा जो तपस्या में विलीन थे। शास्त्रों के अनुसार तपस्या में विलीन गणेश जी रत्न जटित सिंहासन पर विराजमान थे। उनके समस्त अंगों पर चंदन लगा हुआ था। उनके गले में पारिजात पुष्पों के साथ स्वर्ण-मणि रत्नों के अनेक हार पड़े थे। उनके कमर में अत्यन्त कोमल रेशम का पीताम्बर लिपटा हुआ था।

देवी तुलसी का मन गणेश जी की और मोहित हो गया। तब देवी तुलसी ने गणेश जी का ध्यान अपनी और आकर्षित करने हेतु उपहास किया। इस कृत्य से गणेश जी का ध्यान भंग हो गया। गणेश जी ने तुलसी से उनका परिचय मांगा तथा उनके आगमन का कारण पूछा।

इस पर गणेश जी ने देवी तुलसी से कहा के, तपस्या में विलीन किसी ब्रह्म योगी का ध्यान भंग करना अशुभ होता है तथा तुलसी द्वारा किए गए इस कृत्य को अमंगलकारी बताया। तुलसी की विवाह की मंशा जानकर गणेश जी ने स्वयं को ब्रह्मचारी बताकर देवी तुलसी के विवाह प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

देवी तुलसी विवाह आवेदन ठुकराए जाने पर गणेश जी से रुष्ट हो गई तथा तुलसी ने क्रोध में आकार गणेश जी को श्राप दे दिया के उनके दो विवाह होंगे। श्रापित गणेश जी तुलसी से कुपित हो उठे और उन्होंने भी देवी तुलसी को श्राप दे दिया। गणेश जी ने तुलसी को श्राप दिया की तुलसी की संतान असुर होगी तथा असुरों द्वारा कुपित हो कर वृक्ष बन जाएगी। एक राक्षस की मां तथा वृक्ष बनने का श्राप सुनकर तुलसी व्यथित हो उठी तथा उन्होंने गणेश जी से क्षमा मांगते हुए उनकी वंदना की।

तुलसी की वंदना सुनकर गणेश जी शांत हो गए तथा उन्होंने तुलसी से कहा की भगवान श्री कृष्ण तुम्हारा कल्याण करेंगे और आपका यह दोष अमंगलकारी न हो। तब गणेशजी ने तुलसी से कहा कि तुम्हारी संतान असुर शंखचूर्ण होगा। गणेश जी ने कहा के हे तुलसी तुम वृक्ष के रूप में नारायण और श्री कृष्ण को प्रिय होगी तथा कलयुग में विश्वकल्याण हेतु मोक्षदायिनी देव वृक्ष के रूप पूजी जाएंगी परंतु मेरे पूजन में तुम्हारा प्रयोग निषेध होगा। तब से ही भगवान श्री गणेश जी की पूजा में तुलसी वर्जित मानी जाती है।

शंख की इन खूबियों को जानकर रह जाएंगे हैरान

समुद्र मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों में एक रत्न शंख है। माता लक्ष्मी के समान शंख भी सागर से उत्पन्न हुआ है इसलिए इसे माता लक्ष्मी का भाई भी कहा जाता है। हिन्दू धर्म में शंख को बहुत ही शुभ माना गया है, इसका कारण यह है कि माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु दोनों ही अपने हाथों में शंख धारण करते हैं। जन सामान्य में ऐसी धारणा है कि, जिस घर में शंख होता है उस घर में सुख-समृद्धि आती है।

वास्तु विज्ञान भी इस तथ्य को मानता है कि शंख में ऐसी खूबियां है जो वास्तु संबंधी कई समस्याओं को दूर करके घर में सकारात्मक उर्जा को आकर्षित करता है जिससे घर में खुशहाली आती है। शंख की ध्वनि जहां तक पहुंचती हैं वहां तक की वायु शुद्ध और उर्जावान हो जाती है। वास्तु विज्ञान के अनुसार सोयी हुई भूमि भी नियमित शंखनाद से जग जाती है। भूमि के जागृत होने से रोग और कष्ट में कमी आती है तथा घर में रहने वाले लोग उन्नति की ओर बढते रहते हैं। भगवान की पूजा में शंख बजाने के पीछे भी यह उद्देश्य होता है कि आस-पास का वातावरण शुद्ध पवित्र रहे।

शंख के प्रकार
शंख मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं -दक्षिणावर्ती, मध्यावर्ती और वामावर्ती। इनमें दक्षिणावर्ती शंख दाईं तरफ से खुलता है, मध्यावर्ती बीच से और वामावर्ती बाईं तरफ से खुलता है। मध्यावर्ती शंख बहुत ही कम मिलते हैं। शास्त्रों में इसे अति चमत्कारिक बताया गया है। इन तीन प्रकार के शंखों के अलावा और भी अनेक प्रकार के शंख पाए जाते हैं जैसे लक्ष्मी शंख, गरुड़ शंख, मणिपुष्पक शंख, गोमुखी शंख, देव शंख, राक्षस शंख, विष्णु शंख, चक्र शंख, पौंड्र शंख, सुघोष शंख, शनि शंख, राहु एवं केतु शंख।

शंख से वास्तु दोष मुक्ति का तरीका
शंख किसी भी दिन घर में लाकर पूजा स्थल में रखा जा सकता है। लेकिन शुभ मुहूर्त विशेष तौर पर होली, रामनवमी, जन्माष्टमी, दुर्गा पूजा, दीपावली के दिन अथवा रवि पुष्य योग या गुरू पुष्य योग में इसे पूजा स्थल में रखकर इसकी धूप-दीप से पूजा की जाए घर में वास्तु दोष का प्रभाव कम होता है। शंख में गाय का दूध रखकर इसका छिड़काव घर में किया जाए तो इससे भी सकारात्मक उर्जा का संचार होता है।